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As I come out in the darkness... the eclipse has just started. The moon is slowly dissolving into the black hollowness of the skies, I watch my inner self sinking in it too... I realise that we are not made up of stardust or light... but of pure darkness. Around us... inside us. That self consuming emptiness, that hardly leaves our side is why we often crave for some one to be beside us... always! " You are sounding depressing again... anything wrong?" My reflection in the pond whispers. " No... am just watching the eclipse... like it's not eating the moon... but me... am compelled to evaluate my life... past is getting eaten up by the unknown time of darkness... and when  I shall heal... I'll rise again. Just like the moon but this time not white with scars but red in blood." " Have patience... or you'll eat up yourself." The voice sounded worried. " May be... but this time... I shall not wait for the brightness to emerge fr

घर वापसी (भाग ६- "वापस घर जाने की आस")

भाग ६ (वापस घर जाने की आस) भाग- १ यहाँ पढ़ें  भाग -२ यहां पढ़ें भाग ३ यहां पढ़ें भाग ४ यहाँ पढ़ें भाग ५ यहां पढ़ें न जाने इतना अपनापन क्यों महसूस होने लगा है। ... धीरे धीरे वापसी की उम्मीद होने लगी है। कैलाश ने मुझसे रत्नेश का फ़ोन नंबर और एड्रेस लिया... रत्नेश ने फ़ोन नंबर बदल लिया था शायद ...किसी तरह उसका नया फ़ोन नंबर ढूँढ के वो ले आया और उसको कॉल लगाया। रत्नेश की बस आवाज़ सुनके ही, मेरे दिल को तसल्ली हो चुकी थी कि कोई मेरा अपना, मेरा इंतज़ार कर रहा होगा... मुझे ढूंढ़ने की कोशिश तो ज़रूर की होगी उन्होंने ... मगर इस जगह पहुंच नहीं पाए होंगे। बात करने का दिल तो था, पर समझ नहीं आया की बात कैसे करू. सो सिर्फ उनकी आवाज़ भर सुनके ही दिल खुश कर लिया। एक बार तो मैंने अपने बेटे की आवाज़ भी सुनी,