घर-वापसी (भाग ८- 'सफर का आगाज़")

भाग- १ यहाँ पढ़ें https://www.loverhyme.com/2018/05/blog-post_99.html 
भाग -२ यहां पढ़ें https://www.loverhyme.com/2018/05/blog-post_25.html
भाग ३ यहां पढ़ें https://www.loverhyme.com/2018/05/blog-post_72.html
भाग ४ यहाँ पढ़ें https://www.loverhyme.com/2018/05/blog-post_27.html
भाग ५ यहां पढ़ें https://www.loverhyme.com/2018/06/blog-post_13.html
भाग ६ यहां पढ़ें https://www.loverhyme.com/2018/07/blog-post_5.html
भाग ७ यहां पढ़ें https://www.loverhyme.com/2018/10/blog-post.html




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रात को किसी के कराहने की आवाज़ आ रही थी.... शायद कोई चोर होगा। मगर उस दर्द भरी आवाज़ को कहीं सुना है... ऐसा लग रहा था।  थोड़ी देर बाद बिजली गुल हो चुकी थी और कमरे मे घना अँधेरा पसरने लगा।


 "अवनि ... दरवाज़ा खोलो...." कैलाश की आवाज़ बाहर से आ रही थी। वीणा गहरी नींद में थी।  दरवाज़ा खोलते ही खून में लथपथ कैलाश को देख मैं डर सी गयी थी।


"हमे अभी जाना होगा... चलो ! मैं पुलिस के पास गया था.... मगर वो अम्माजी से मिली हुई है.... उन्होंने शायद अम्माजी को खबर भी कर दी हो। अगर जान बचानी है तो अभी चलो ...." कैलाश बिना रुके बोला।


"मैंने कहा था न ... इस दल-दल से निकलना आसान नहीं। ... अब क्या होगा !!! तुम जाओ यहां से, अपनी जान बचाओ .... मैं,  मैं देखलूँगी जो होगा, तुम जाओ... हाथ जोड़ती हूँ तुम्हारे , जाओ!!!" मैं रोते हुए बोली।


"पागल मत बनो.... ये पिटाई क्या मैंने इसी लिए खायी है ... अब चलो भी!" वो मेरा हाथ पकड़ बोला।



अब  जो भी हो, मुझे जाना है.... फैसला हो चुका ... मौत या रिहाई... 


छुपते- छुपाते हम निकल ही आये.... न जाने आज इस क़ैदगाह के दरवाज़े  कैसे खुले रह गए। ... या फिर मैं ही उड़ना भूल चुकी थी? मगर डर अभी भी कहीं सर उठा रहा था  और मुझे समझ नहीं आ रहा था की क्या होगा।



कैलाश पे भरोसा कर के कहीं मैंने कोई गलती तो नहीं कर दी ? पर अब निकल ही पड़ी हूँ जान हथेली पे लिए, तो मौत से क्या डरना।  मरना तो है ही एक दिन ... चलो आज ही सही !



उजाला हो चुका था और उसके सर से बहते खून को देख  मुझे दुःख होने लगा , आखिर मेरे ही कारण उसका ये हाल जो हुआ था।



हम वह शहर पीछे छोड़ आये थे... मेरे ज़िद्द करने पे उसने आखिर एक जगह रुक कर पट्टी करवाई. डॉक्टर ने ज़ख्म गहरा देख एडमिट होने की हिदायत दी, पर वो कहाँ सुनने वाला था किसी की। वो तो मुझे मेरी मंज़िल तक पहुुँचाना चाहता था। ... सिरफिरा इंसान !



क़रीब ६ घंटे का सफर कर चुकने के बाद भी हम अपनी मंज़िल से कोसो दूर थे ... बीच में बस खाने के लिए रुके होंगे कि पता चला कि अम्माजी ने पुलिसवालों  को हमारे पीछे लगा दिया था, पर तब तक हम स्टेट - बॉर्डर पार चुके थे।दिल को कुछ राहत मिली।




मेरा घर अब बहुत नज़दीक था अब... बस २ घंटे और.... धड़कन जैसे गाडी की  स्पीड के साथ दौड़ लगा रही हो। मैं मुस्कुराने लगी और कैलाश भी। उसकी आँखें मेरे चेहरे को नज़र-अंदाज़ नहीं करती दिख़ रही थी।



कभी कभी सब खो कर इंसान पाने की एहमियत समझता है ... मैं ३ साल से उस कोठरी में घर-वापसी की उम्मीद खो चुकी थी।  आज अपनी रिहाई ... अपने घर को वापसी पा कर मैं खुश हो रही थी।



 रब सबको हिफाज़त से रखे... सबको शैतानों से बचा के रखे !!!


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