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Locks of Winter

Locks of winter fall on ground She has a hairfall all around. The bits of ice Quietly disguised Fall on ground Fall...fall...all around.
The hair has turned grey... With white mist mixed clay... The cold waves carrying around... Her white hair falling all around. Locks of winter  Shining in moonlight She has let open her hair... To fall down back...on ground.
She flaunts... Plays... Rhythmically Throughout the night. She wears a gown of fog... With slippers of glass that hold... Her feet dancing on the ground... Her ashes of white all around...
When light is low And no birds show Her heartbeats reverberate. In the quiet spaces Where darkness creeps And shadows sleep. Before the day begins, She rises in air Leaving frozen breaths as dew At dawn over the leaves .
The sunlight dim Fears to face The gaze of the mighty chill The winter as a Queen Has a hairfall it seems But the more they fall, The more she grows Gracious winter  Has lovely white hair.

(C) Ravinder Kaur       12-12-2018


When colours fade away... Like the sound of a horse's gallop... Distant... invisible... inaudible. I hear you still Inside my heart As my own heartbeat. But you want to leave... Like the breath that leaves My heart and vanishes in thin air. And so I open up my hands To let your fingers slip away...

Stagnant water I am...
And you a ship. 
And... I cannot be your harbour.

(C) Ravinder Kaur

घर-वापसी (भाग ८- 'सफर का आगाज़")

भाग- १ यहाँ पढ़ें 
भाग -२ यहां पढ़ें
भाग ३ यहां पढ़ें
भाग ४ यहाँ पढ़ें
भाग ५ यहां पढ़ें
भाग ६ यहां पढ़ें
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रात को किसी के कराहने की आवाज़ आ रही थी.... शायद कोई चोर होगा। मगर उस दर्द भरी आवाज़ को कहीं सुना है... ऐसा लग रहा था।  थोड़ी देर बाद बिजली गुल हो चुकी थी और कमरे मे घना अँधेरा पसरने लगा।

 "अवनि ... दरवाज़ा खोलो...." कैलाश की आवाज़ बाहर से आ रही थी। वीणा गहरी नींद में थी।  दरवाज़ा खोलते ही खून में लथपथ कैलाश को देख मैं डर सी गयी थी।

"हमे अभी जाना होगा... चलो ! मैं पुलिस के पास गया था.... मगर वो अम्माजी से मिली हुई है.... उन्होंने शायद अम्माजी को खबर भी कर दी हो। अगर जान बचानी है तो अभी चलो ...." कैलाश …

Between you and me...

Your name truly suits you "Assumptions" and mine "Conclusions". But you know without you I cannot be reached to and without me you are incomplete. So please stop assuming me and I would want to stop concluding you for what is there in between is yet to be lived, experienced and resolved.
Your value will always be variable but mine always constant but with you. You may call me stubborn and not wanting to change but your changes are highly irritating. But you know dear, if you change I shall have to change too. May be that is what you always wish for... to change me.
But there is something missing and that's what it is all about.The journey in between; the heart beating between two breaths, raindrops between the clouds and the ground. Something that ought to be there but is not.The absent feelings ...the unknown derivation. The dark...the truth.The story...the whole. And not just the start and the end.
So stop loving me because my value changes in any case. And …

Flowers on my grave...

Tell me how would you remember... My giggles on swing rising high? Tell me will you remember... Those moments in the dark? Twisted tongues and riddles... Stutters and meaningless scribbles!
Tell me will you remember... Those evening walks ending at nights, Morning sun bathing out coldnight faces, Tell me how will you remember my meaningless smiles?
On breakfast table your coffee going cold,  My hot tea in your hand; kissing your lips for a while, Will you remember those surprise visits intruding my dreams of you... When sun bit the last slice of the noon bright?
When nights shun away the lights, Tell me when will you sleep? And not hide your face under the pillow; When will you stop sharing those tears with the night skies?
When will you stop reminiscing? When will you accept am gone far off sight? Tell me when will you forget... To weep and place your hands over me?
On this grave of mine... Just walk past, don't look back! Let this be the last flower, On my grave in this lifetim…

घर वापसी (भाग ७ -"ये कैसी मोहब्बत है?")

घर वापसी, भाग ७ -ये कैसी मोहब्बत है

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नल के नीचे लगा घड़ा भर के छलक गया था... मेरे ध्यान न देने पर सब मेरा और कैलाश का मज़ाक उड़ाने लगे। मैं झल्लाते हुए घड़ा उठाने को आगे हुई ही थी, कि दो हाथों ने घड़ा बीच में ही अपनी तरफ खींच लिया। मेरे देखने से पहले ही वीना और बुलबुल ज़ोर ज़ोर से हँसने लगीं ।

"लो! ... अब ये ही बाकी रह गया था। ... जाओ दीदी चाय बना लाओ... कहो तो हम ही बना दें , तुम्हे तकल्लुफ  न हो तो...  " दोनों मुझे चिढ़ा रही थीं।

हाँ इस आदमी ने तो मुझे यही खरीद रखा है, पता नहीं अम्मा जी को कितने हरे पत्ते बाँट आता है कि वो इसे इस तरह यहाँ आने देती ... हाथ भींचते हुए…


As I come out in the darkness... the eclipse has just started. The moon is slowly dissolving into the black hollowness of the skies, I watch my inner self sinking in it too...
I realise that we are not made up of stardust or light... but of pure darkness. Around us... inside us. That self consuming emptiness, that hardly leaves our side is why we often crave for some one to be beside us... always!

" You are sounding depressing again... anything wrong?" My reflection in the pond whispers.

" No... am just watching the eclipse... like it's not eating the moon... but me... am compelled to evaluate my life... past is getting eaten up by the unknown time of darkness... and when  I shall heal... I'll rise again. Just like the moon but this time not white with scars but red in blood."

" Have patience... or you'll eat up yourself." The voice sounded worried.

" May be... but this time... I shall not wait for the brightness to emerge from nowhere..…

घर वापसी (भाग ६- "वापस घर जाने की आस")

भाग ६ (वापस घर जाने की आस)

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न जाने इतना अपनापन क्यों महसूस होने लगा है। ... धीरे धीरे वापसी की उम्मीद होने लगी है।

कैलाश ने मुझसे रत्नेश का फ़ोन नंबर और एड्रेस लिया... रत्नेश ने फ़ोन नंबर बदल लिया था शायद ...किसी तरह उसका नया फ़ोन नंबर ढूँढ के वो ले आया और उसको कॉल लगाया।

रत्नेश की बस आवाज़ सुनके ही, मेरे दिल को तसल्ली हो चुकी थी कि कोई मेरा अपना, मेरा इंतज़ार कर रहा होगा... मुझे ढूंढ़ने की कोशिश तो ज़रूर की होगी उन्होंने ... मगर इस जगह पहुंच नहीं पाए होंगे।

बात करने का दिल तो था, पर समझ नहीं आया की बात कैसे करू. सो सिर्फ उनकी आवाज़ भर सुनके ही दिल खुश कर लिया। एक बार तो मैंने अपने बेटे की आवाज़ भी सुनी, उसी ने फोन उठाया था... बड़ा  हो गया है अब,…

What is Goodbye...afterall?

What is goodbye afterall...if only it had to be just said, but not felt in the heart...when the memories drown you every now and then, making you vulnerable.

What is goodbye afterall...if you touch your scars and feel the pain again and again, like they are still fresh.

What is goodbye afterall...if your tears flow, eventhough times have crossed bridges of months and years.

What is goodbye afterall...when you try all the while to live, but die each day remembering them whom you love.

What is goodbye afterall...when you never think it would end so soon, that your mind keeps hanging in confusion.

What is goodbye afterall...when you remember them, each time you touch something you both shared.

What is goodbye afterall...when your playlist is full of their favourite songs, and you put them in loop, listening to each with tears in your eyes.

What is goodbye afterall...when the silence is full of their whisperings and, loneliness full of their memories.

What is goodbye afterall...when each…

घर वापसी (भाग ५ "उम्मीद का तोहफा")

घर वापसी  (भाग ५  "उम्मीद का तोहफा")

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उस दिन तो कैलाश चला गया, पर उसका ये कहना कि वह मुझे इस दल-दल से निकालना चाहता है, कुछ देर के लिए अच्छा लगा सुनके। शायद मैं अपने परिवार के पास चली जाउंगी।पर ये सब इतना आसान नहीं जितना लगता है।

३ साल के इस सफर ने मुझे कितना पत्थर बना दिया , ये मुझे ही पता है। वो पहला दिन भी याद है मुझे, जब यहाँ लायी गयी थी.... धोखे से ! और फिर ज़ोर- ज़बरदस्ती से तिल-तिल कर के मारी गयी रोज़, तक तक...  जब तक कि इस पिंजरे के दरवाज़े खुले होने पे भी मैं यहाँ से भागने की कोशिश न कर सकूँ। 

अपना घर , परिवार छोड़ चुकी औरत पे तो हर कोई हक़ समझता है।सड़क पे होते हर उस शर्मनाक हादसे में औरत जीते- जी मरती है ... कुछ तो ये समाज उसकी ज़िन्दगी दुश्वार कर देता है और कुछ अपने ही लोग....

और यहाँ ....  चंद पैसो…

घर वापसी (भाग ४ -" ख़ामोशी का तूफ़ान")

भाग ४ -" ख़ामोशी का तूफ़ान

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५ दिन बीत गए... वो नहीं आया।  आया तो मेरी बला से ... मुझे क्या?  और हज़ारों हैं यहाँ आने वाले... पौधों को पानी देती-देती बड़बड़ा रही थी मैं।

गीले बालों में तौलिया लपेटे हुए... बारिश के मौसम की धूप का मज़ा ले ही रही थी, कि अफ़रातफ़री मच गयी। बुलबुल चहकती हुई वीना के कान में कुछ फुसफुसा रही थी।  वैसे भी उसे काम ही क्या !

"दीदी... वो आ गया फिर। " हौले से मेरे कान में बताने को वीना  दबे पाँव पहुंची थी।

"तो !!! मैं क्या करूँ?  जा के बोल दे उसे और अम्माजी से ... किसी और को भेज दें उसके स्वागत में, मुझे माफ़ करें ", मैं गुस्से में वीना से बोली।

"हाँ तो तुम्हे कौन मिलने आएगा ... नकचढ़ी लड़की! यहाँ जिसके ऊपर हाथ रखदूँ ना...पैसे निकाल के... खुद वो मेरे पैरों  में गिरेगी ", कैलाश के तीखे शब्द मेरे कानों को भेद रहे थे।


घर वापसी (भाग ३ "छुपे आंसूँ ")

भाग ३  "छुपे आंसूँ "

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"आज भी पैसे बर्बाद करने आये हो?", मैं उसे छेड़ते हुए बोली।

"कुछ पुछूँ तो बताओगी?  उस दिन की तरह मूर्ति तो नहीं हो जाओगी?", कप रखते हुए, वो मेरी नक़ल उतारता हुआ बोला।

देखते ही मेरा लबों से हँसी फ़ूट पड़ी।  इतना हँसी इतना हँसी कि आँखें आंसुओं से भर गयी। मेरा हँसना कब रोने में बदल गया, मुझे भी पता न चला।

और कब उसके कंधे पे मेरा सिर और उसकी बाहें मुझसे लिपटी.... नहीं पता।  बस दरवाज़े को बंद करता, इक ज़ोर से धड़ाम की आवाज़ ने  हमे चौंका दिया। और अम्माजी बाहर से चिल्लाती हुुई निकली, "कम- से- कम ई दरवज्जा लगाय लेना था , चिटकनी नहीं का ... "

झट से उससे बाहें छुड़ा, मैं कमरे के दुसरे ओर जा पहुंची।

आज ये शाम  भी न जाने, कब दफ़ा होगी। खीझ सी होने लगी है इस बंद कमरे में।

"मेरा नाम नहीं पूछा तुमने अब तक। सोचा खुद ही बता दूँ। मेरा नाम कैलाश है। तुम्हारा क्या है?" ये बड़ा अजीब तरीका जान- पहचान  का।

घर वापसी ( भाग -२ "तनहा है खुद तन्हाई ")

भाग-२  "तनहा है खुद तन्हाई "

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रात हो चली.... मगर आँखों में नींद नहीं।  आज ४ दिन हो गए इसी तरह।

 दिमाग के घोड़े चल चल के थक गए हैं... शायद।

३ साल हो गए यहाँ मुझे, अम्माजी के यहाँ ... मगर कोई पैसे दे के तन्हाई भर गया, ये अजीब वाक़या पहले कभी नहीं हुआ...

लोग तो इन बंद चारदीवारों में खुद के बोझिल होते मन को   किसी और के जिस्म पे लादने भर आते।  आखिर क्यों?

मेरे दिमाग में इतने सवाल, पर कोई जवाब नहीं।  शायद आज नींद भी नहीं आएगी।  बिस्तर भी काट रहा ... बैठ के खिड़की से खाली आसमान ही देख लेती हूँ।

"दीदी ... सो जाओ ना ... अम्माजी गुस्सा करेंगी अगर सुबह आँखें सूजी हुई देखी उन्होंने ... "

वीना के खर्राटे शुरू हो चुके थे ... और मैं.... शायद मेरी आँखें खुल चुकी थी।

ज़िन्दगी कितनी अजीब है ना ... जब सब देती है तो अकल पे पत्थर पड़ जाते हैं और....  जब सब समझ आ जाए तब तक हाथ बंध चुके होते हैं।

अतीत की परछाईयाँ उस हिलते परदे के पीछे से लुका- छिपी खेलने लगी। 

काश उस दिन मैं, यूँही गुस्से में घर से न निकली होती …

घर वापसी ( भाग - १ "सब बिकता है")

भाग - १  "सब बिकता है"

ज़िन्दगी न जाने किस क़र्ज़ का ब्याज मांग रही है? कुछ देर तन्हाई भी नहीं मिलती और... एक नयी सुबह रात की तरह आँखों -आँखों में गुज़र जाती है।

अम्मा एक नया ग्राहक लायी हैं। मुझे उसे खुश करने का कह गयी.

आईना भी जैसे बेपर्दा होके, मेरे जिस्म पे पिछली रात के रिसते हुए ज़ख्मों पे हँस रहा हो।

" ये क्या? मांग सूनी क्यों राखी तुमने? और गला.... अरे मंगलसूत्र पहना करो न!  इस तरह सादी मत रहा करो। " रत्नेश की आवाज़ कानो में घुल रही थी।

बिख़री यादों की अलमारी कभी सवरती  नहीं।  उनपे चढ़ी धूल कभी धुंधली नहीं होती।

ज़ोर की आवाज़ ने मेरी यादों की अलमारी आखिर कब बंद करवा दी पता ही न चला।

"दीदी दरवाज़ा खोलो... अम्माजी बोली बस आधा घंटा और... तैयार हो गयी क्या? दीदी?" वीना बाहर  दरवाज़ा फोड़ रही थी।

" बस हो ही गयी ... सुनना ... कुछ खाने को ला दे।  भूख लग आयी। ", मैं कह के गुसलखाने में तौलिये संग चल पड़ी।

ये बदनाम गली न जाने कितने नाम वालों को बाहें खोल बुला रही है ... "


एकाएक  मेरी हँसी फूट पड़ी।

तैयार होकर, कुछ फ़ीकी सी मुस्कान लि…

कब तक रूठोगे भला?

दस बार उठे होंगे हाथ तुम्हे कुछ लिखने को,
पर दिल थम जाता है तेरा नाम ही लिखते... सुन रहे हो!

कोई लफ्ज़ लिखा जाता नहीं, स्याही शर्मा सी जाती है,
कागज़ को भी जैसे गुदगुदी हो जाती है.

हँस लेती हूँ सोच के तुम क्या आगे कहोगे?
मेरी नादानियों पे थोड़ा तंज़ कुछ तो कसोगे.

फ़ोन इक तरफ रख के ज़ोर से हँस लेती हूँ,
कुछ दिन और यूँ रूठी हुई रह लेती हूँ.

दो बार तो तुमसे फ़िर मुड़ मुलाक़ात की है,
इस तीसरी बार थोड़ा इत्मिनान रख लेती हूँ.

इस ख़ामोशी में तेरी जली-कटी फिर सुनलेती हूँ,
क्या करुँ ... तेरी बेरुख़ी सह लेती हूँ.

कुछ सुनने से सुनाना भला?
अरे कहो भी कुछ... कब तक रूठोगे भला?

To be a Queen...

I was brought up as a princess... and you know what that means?
It means, that I had all of my wishes come true... or to say ... all were made true by my dad.
I was handed over to a king... because a queen is said to belong to a king and not to anyone less.
So... I became a Queen!
A queen, infamous of required action, because my king was the ruler...and I, mere a spectator. But the reigns soon fell into my hands, when the king lost his life... and I had to become the king, inspite of being the rumoured- inefficient queen.
I bore no child so the kingdom was nevertheless my own family... they were my children and I their mother and this is what I assumed and failed miserably at.
Lost in the cascade of battles, I was torn like a piece of cloth and sold like meat. The buyer was...ofcourse a king and, I a hopeless slave.

I was held captive...not even given the status of a royal in prison but... a slave to whom the king could keep... as a war prisoner.

Life was never a burden before... but …

The unfamiliar...

What do you think I want in all this? Practically speaking... I want all.

The all you have... as You.

I have heard people in love when they leave.... they leave a lot of themselves back in others...

Their ideologies....their way of talking...their specific and special terms of the language that they use and ofcourse how they used to respond to in any condition ....

They leave a part of themselves in the people they love and that is what makes it hard to forget them...because they seep into your DNA and become hard to part with...

I don't want  parts of me in you... I want to see you in you... I want to see how different you different from unique you are. I dont want the familiar side of you...I wanna see the

 To mean... I want to learn you by your soul's fire.... I wanna embrace the unfamiliar you.

Image :

When clouds become flock of sheep...

When clouds become flock of sheep... Your thoughts become fallen leaves... I dream about a weird tree... That is never green...

When dew drops load their weight on nights... Struggling to dilute as lights arise... Forming crystals of silver on broken leaves... Shining like diamonds bright.

Unwrapped day in buds of blue... Turning pots of uncooked stew... Flames of heat simmering then... To cook all day long then.

Propelled by the rising Sun... Increasing heights till up it hung... Then slowly sliding towards the end... In cool waters laying far at end.

The night dilutes its blue black ink Letting those trapped fireflies twinkle As the breeze sighs every now and then The moon stands still in masked silence.

Dreams emerge like ghosts Entering the sleeping corpses Touching their quiet hollowness Filling with sounds of forgotten voices.

When clouds become flock of sheep... Entering the borderless skies Your dreams they bring and take Across my uncountable nights.


Crawling shadows...

I never knew how past would again and again torment me...the little child in me stays awake. Wanting someone to hold my hand and say," it's with you." 
The shadows howl at me, singing crazy songs of childhood lullabies; keeping me awake. I fight with my mind to sleep. Lights blind me, disclosing the faces of known own ones playing with me... destroying my joy of childhood.
Am alone in this one to hear but me the screams of my alone to survive the pain and agony which I am unable to comprehend and produce the same in written words or spoken. But trust dying each day with the guilt of something, that I haven't done but being the victim of which has been more tormenting...
It's like seeing myself each night...fighting to survive the hallucination... fighting to survive the death of my childhood... 
Am fighting to slow down be an understand the vanished phase between my childhood and youth…