Thursday, 5 January 2017

ज़ख्म-ए-ज़िन्दगी






                                                                 ज़ख्म-ए-ज़िन्दगी



भोपाल से बैंगलोर .. एकतरफा सफ़र 

अब इस उम्र में क्या जाना घर के बाहर ... यही सोच के पिछले चार महीनों से टाल रही थी मैं... पर अब उसका फ़ोन पे दुखी आवाज़ में माँ कह के कॉल काट देना मुझसे बर्दाश्त नहीं होता। मन मार के ही सही मेरा सफर शुरू हो चुका है , अब ज़िन्दगी में इतना कुछ तो हो चुका... चलो ये भी सही। 


प्लेन में पहली बार बैठी हूँ और नज़ारा सच में बिलकुल ही अत्भुत ! शादी के 25 सालों में पहली बार हवाई यात्रा... मन ही मन मुस्कुरा रही हूँ,पति इतना धनवान पर कभी साथ, कहीँ भी नहीं ले गए। और बेटा... वो टिकेट भेजे बिना मान नहीं रहा... मुझे आख़िरकार अपने पास बुला ही लिया उसने।


एयरहोस्टेस कुछ बता रही है... पर मेरा ध्यान तो कहीं और जा रहा है... पंख प्लेन को लगे हुए हैं और उड़ मैं रही हूँ... मगर पीछे... और पीछे... 26 साल पहले... 
"मेरा रिश्ता मांगने  कब आओगे सतीश ? कॉलेज का आखिरी साल भी खत्म होने को है... और घर में रिश्ते को ले के पूछ परख होने लगी है...कब तक टालोगे? अब तो घर में बात करो!" मैं खीझ के बोली।


" मृदुला ... मैं समझता हूँ.... पर तुम जानती हो न .. नौकरी बिना तुम्हारे बाबूजी मुझसे तुम्हारी शादी नहीं करेंगे।  देखो मैं कोशिश कर रहा हूँ... जैसे ही मेरी नौकरी लगेगी... मैं खुद बाउजी के साथ तुम्हारे घर आऊंगा।  अब नाराज़ मत हो...हँस भी दो ना ... "

"एक्सक्यूज़ मी ! प्लीज बेल्ट लगा लीजिये .... प्लेन टेक ऑफ करने वाला है... " एयरहोस्टेस ने मुझे मेरी यादों से बाहर खींच लिया... हड़बड़ी में बेल्ट के सिरे ढूंढने  लगी थी, कि एक दबी सी हँसी मेरे साथ वाली सीट से सुनायी दी...एक नया नवेला  जोड़ा ... घूमने निकले होंगे... हाथों में हाथ डाले, ख़ुशी ज़ाहिर कर रहे थे... उनके इतने नज़दीकियों से एक पल के लिए दिल में ईर्ष्या सी उठने लगी...
प्लेन रनवे पे दौड़ रहा था और कब हवा संग हो लिया... मेरे ख्यालों को भी पता नहीं चला।उस जोड़े को देखते देखते दिल में टीस उठने लगी... मन फिर अतीत में उड़ चला...

"मेरी बात समझने की कोशिश कीजिये मामाजी .....मृदुला उस घर में राज करेगी राज .... इतना पैसा उनके पास... इतने बड़े आदमी। हम जैसे लोग तो दहेज़ जोड़ते जोड़ते ही सारी  ज़िन्दगी परेशान हो जाते.... उन्हें तो कुछ चाहिए ही नहीं। ...बस  एक सुशील लड़की जो उनका घर संभाल ले बस! आखिर हम भी तो अपना फ़र्ज़ पूरा कर गंगा नहा लें... " सुरेश भैया रिश्ता ले के आये थे...


" माना सुरेश तुम ठीक बोल रहे हो पर.... तुम सच जानते ही हो...मृदुला... उसका 6 महीने पहले ही इतना बड़ा एक्सीडेंट हुआ है... और... और...सारी ज़िन्दगी अगर उसे तानें सुन के ही गुज़ारनी  है तो, वो कुंवारी ही ठीक है। " बाबूजी रूआँसे से हो के बोल पड़े। 


"मैं जानता हूँ मामाजी ... और मैंने उन्हें ये बता भी दिया है... आपसे कुछ कहना था... कैसे कहूँ ... दरअसल गिरीश की पहले शादी हो चुकी है... मगर पिछले साल बेटे को जन्म देते वक़्त, उसकी पत्नी इस दुनिया को छोड़ के चली गयी. उन्हें फ़िक्र बस अपने उस बेटे की है ... जो अभी भी माँ के प्यार को तरस रहा है....
देखिये ! इससे अच्छा रिश्ता कहाँ मिलेगा... अपनी बेटी की इज़्ज़त बनी रहेगी ... माँ नहीं बन पाने का इलज़ाम भी धरा का धरा रह जायेगा...आप तो जानते ही हैं ना... समाज और लोग किसी के सग्गे नहीं होते.... लोग कितनी बातें करते हैं । ... कम से काम इस शादी के बहाने ही वह इससे बच जाएगी। बाकी आप की मर्ज़ी !"

सुरेश भैया सर झुक के बैठे रहे। बाबूजी ने हामी भर दी और मेरा रिश्ता पक्का हो गया।  इस बीच मैंने कितनी बार सतीश को संदेसा  भेजा  पर शायद उसे मिला ही नहीं ...नहीं तो वो ज़रूर आता।  या फिर शायद उसे मेरे एक्सीडेंट का पता चल गया... मैं उसके लिए शायद अब बेकार थी.... कौन  लड़का ऐसी लड़की से शादी करेगा जो उसे पिता न बना सके... यही सोच कर मैं भी चुप हो गयी... किस्मत मान के इस रिश्ते को अपना लिया.... भाग्य ! किस्मत ! नसीब ! जो भी बोलो !

"मैम ! क्या लेंगी आप?" एयरहोस्टेस ने फिर मुझे हकीकत में खींच लिया... 

"कुछ नहीं... बस एक गिलास पानी ...प्लीज !" कह के मैं फिर उस नए जोड़े को निहारने लगी।
 सच है....ज़िन्दगी में हम आते तो खाली हाथ हैं... पर इन हाथों में अपनों के हाथ...यही तो चाहत होती है। दिल  में फिर दर्द उठने लगा.... सतीश से बिछड़के सोचा था मेरा पति.... मेरा परमेश्वर , मेरा जीवनसाथी ...शायद किस्मत में थोड़ा प्यार तो होगा? पर नहीं ! उन्हें मेरी परवाह कहाँ थी...वो अपनी मरी हुई बीवी को इतना चाहते थे कि वो उनके लिए अब भी ज़िंदा थी और मैं... ज़िंदा होते हुए भी उनकी कुछ नहीं! 

मेरा काम तो बस उनके बेटे को संभालने भर का था...शायद सिन्दूर तो मांग में उनके नाम का भर लिया था मैंने ....पर सारी उम्र प्यार और अपनेपन के लिए तरसने को ज़िंदा रहना ही  किस्मत में लिखा था ... वो अपने कारोबार को बढ़ाने में इतने व्यस्त थे कि कभी मेरी सुध ली ही नहीं... और मैं पत्नी नहीं, सिर्फ माँ बनके ही रह गयी... सच माँ बनना प्रकृति की देन है... पर मैं तो बिना उस पीड़ा को झेले ऐसी माँ बन गयी, जिसकी पीड़ा सारी उम्र मुझे अकेले ही झेलनी होगी...एक अकेलापन... एक खालीपन... जिसे मैं जितना भी चाहूँ भर नहीं पाऊँगी....

सिरहन होती है जब.... तो चाहती हूँ की मैं भी किसी के नरम हाथों को खुद पे महसूस करूँ... पर शायद ... शायद मेरे नसीब में... बस ये दुःख है...जिसे मैं चाह के भी किसी के आगे बयाँ नहीं कर सकती... आंसू बहाऊँ तो तन्हाई में... खुद के ही गले लग के...

एक-दो साल के बच्चे की मीठी आवाज़ ने मेरी यादों की यात्रा को थोड़ी देर के लिए रोक लिया.... पास में एक परिवार बैठा था.... जिनका बेटा  बार बार शरारत करता.... माँ को पीछे यहाँ-वहाँ  दौड़ा रहा था वो  ...मेरे होंठों पे एका-एक हंसी आ गयी...रोहन भी यही करता था... सारा दिन बाहर आँगन में... शरारतें करता... पढ़ने बिठाओ तो भाग जाता... दिन भर मटरगश्ती... लेकिन जब सयाना हुआ तो इतना कि उम्र को भी मात दे दी उसने... पिता बेशक़ उसे दुलार करते ... पर वो बेफिक्री से अपनी बात सिर्फ मुझे ही बताता... स्कूल की शैतानियाँ , पंगे ...और कौन सी लड़की के घर आज कल तफ़री... सब!  माँ से ज़्यादा दोस्त बना रखा था उसने मुझे.... आखिर उसके हर पल की गवाह जो थी मैं... उसके बचपन ..उसके यौवन... उसकी सगाई और उसकी शादी। 
 मुझसे दूर नहीं जाना चाहता था वो, पर देखो 3 साल से बैंगलोर में अकेले रहा... पढ़ा... नौकरी करी.... और छोकरी भी खुद ही ढून्ढ ली.... मुझे दौड़ाया नहीं... हाहाहा
वक़्त कितना बदल चुका ना... बच्चे समझदार तो माँ बाप को आराम।

प्लेन लैंड होने का टाइम हो गया... एयरहोस्टेस बता रही है... वैसे कौन सा मुझे सामान समेटना है... सो मैं ऊँगली में अंगूठी घुमाने लगी जो रोहन ने हमारी 25वी सालगिरह पे मुझे तोहफे में दी थी... इस शादी से कोई खुश था या नहीं, बस वो ज़रूर खुश था ...और उसकी यही ख़ुशी मेरे लिए अनमोल थी...

औरत की ज़िन्दगी भी बड़ी विचित्र होती है... उससे दूसरों की ख़ुशी जुडी होती है... सतीश के बाद अगर किसी ने मुझे वजह दी मुस्कुराने की, तो वो मेरा बेटा रोहन ही था...

प्लेन रुक चुका था...  और सारे पैसेंजर्स एक एक कर के उतरने लगे ....बैंगलोर की धूप भी कमाल की.... खुशनुमा मौसम.... जैसे मेरा स्वागत कर रहा हो.... एयरपोर्ट पे रोहन और काजल, उसकी पत्नी ...  मेरा इंतज़ार कर रहे थे... मुझसे मिलते ही काजल मेरे पैरों को छूने लगी.... आज के वक़्त में भला कौन मॉडर्न लड़की पैर छूती... यही सोच के हैरान सी हो गयी मैं... और रोहन... वो तो इतना खुश था कि मैं क्या  कहूँ ....काजल को दिल से लगा, जैसे मुझे कुछ देर के लिए बेहोशी से होश आया हो... आखिर मैं सास जो बन चुकी थी... एयरपोर्ट से लेकर घर तक... रोहन के बातों का पिटारा खाली ही नहीं हुआ... "माँ.. बहुत मिस किया तुम्हे... सुबह से बैठा हूँ कि प्लेन कब आएगा.... कब तुम्हे देखूंगा ?' उसकी बातों पे काजल हंसे जा रही थी...,"मम्मीजी ! ये न रात भरे सोये नहीं कि आज आप आ रहे हो ... अब तो आपको हम वापस जाने नहीं देंगे..."

प्यार जब किश्तों में मिलता है तो पता नहीं चलता कि  प्यार मिला भी कि नहीं... और जब अचानक से एक मुश्त मिल जाता है तो, ख़ुशी पे भरोसा ही मुश्किल हो जाता है.... प्यार घर को सुखी बना देता है....

आज तो थक गयी मैं... बस आराम करना चाहती हूँ पर रोहन...  मुझे छोड़ के राज़ी ही नहीं... अब भी वैसा ही जी बच्चा.... बचपन में अगर 2 -3  दिन के लिए भी मैं बाबूजी के यहाँ चली जाती तो तूफ़ान मचा देता। ... पता नहीं ये 3 साल मेरे बिना कैसे गुज़ार लीये इसने ?
"माँ तुम आराम करो... वैसे प्लेन तो तुम ही उड़ा के लायी हो लगता है.... थकी हुई सी लगती हो। ..."
कहता हुआ वो मुझे कमरे में छोड़ गया....

नयी जगह नींद भी तो नहीं आती...और ये बैंगलोर ... दिन रात लोग काम करते... आने जाने का कोई वक़्त नहीं यहाँ.... जब जागो तभी सवेरा...पर मुझे 5 बजे के बाद नींद आती ही नहीं....
नाश्ता बनाने रसोई में घुसी ही थी कि रोहन और काजल दोनों नाराज़ हो गए... काजल बेशक़ जॉब करती थी.... पर रोहन की तरह वो भी मेरी परवाह करती थी... कोई काम नहीं करने दिया उसने मुझे...

"माँ... शाम को ऑफिस में पार्टी है... आपको चलना है... तैयार रहना... काजल घर पे ही है आज.... आपके पास... मैं  शाम को आऊंगा... ", रोहन ने फरमान जारी करदिया... टालने का कोई रास्ता ही नहीं बचा... 


पूरा दिन काजल से बातों में बीत... रोहन की पसंद बहुत ही उम्दा थी... वो जितनी मॉडर्न थी , उतनी ही सुलझी हुई लड़की... बड़ों की इज़्ज़त और परवाह करने वाली... बहु से ज़्यादा सहेली सी बन गयी थी वो मेरी... शाम को खुद तैयार होने से पहले... मुझे तैयार कर गयी... साड़ी से लेकर ज्वेलरी और पर्स तक... सब कुछ।  वैसे लड़कियाँ सवरने  में बड़ा टाइम लगाती हैं, पर वो फ़टाफ़ट तैयार... रोहन आया... उसके लिए काजल ने कॉफ़ी बनायीं और हम दोनों के लिए चाय। 6 बजे  ही हम तीनों निकल चुके रोहन की कार में...


उसका ऑफिस बहुत बड़ी बिल्डिंग में था। हम छोटे शहरवालों के लिए तो बहुत बड़ी थी वो। रोहन बताता जा रहा था.. ऑफिस के बारे में... फर्स्ट फ्लोर पे ये ...सेकंड पे वो... वो खुद 7वी फ्लोर पे।  सबसे मिलवाया उसने, अपने कॉलीग्स से औए अंत में अपने बॉस से....

 सोचा नहीं था कि  किस्मत मुझे फिर उसी शक़्स से मिलवा देगी, जिससे बिछड़े न जाने कितना वक़्त बीत चुका ... मेरा गुज़रा कल... आज फिर सामने खड़ा था... रोहन का बॉस बन के.... सतीश!

देखते ही सांसें रुक सी गयी थी मेरी.... हलके से सर हिला के नमस्ते ही कर पायी मैं उसे।  रोहन और काजल अपने साथियों से मिलने में व्यस्त से हो गए... मैं सतीश के सामने खुद को अपराधी सा महसूस कर रही थी... उसकी नज़रें मुझ पर से न हटते देख, मैं खिड़की की तरफ चल पड़ी... रुकी हुई सांसें अक्सर धड़कनों को बढ़ा देती हैं.... कुछ पल के लिए मुझे समझ ही नहीं आ रहा था की ये सब क्या हो रहा है?

"कैसी हो मृदुला.....मुझे उम्मीद नहीं थी, कि तुमसे फिर ज़िन्दगी में मुलाक़ात होगी?" सतीश ने एक सांस में कहा।
" ह्म्म्म... ठीक हूँ. तुम... तुम कैसे हो?" मैं उससे बात नहीं करना चाहती थी... पर कोई रास्ता नहीं था।

"वैसा ही हूँ.... जैसा तुम छोड़ गयी थी... तुमने तो शायद मेरा इंतज़ार भी नहीं किया... पर मैं आज तक करता रहा..." कह के वो टेबल पे पड़े गिलास में पानी डालने लगा।

"तुम्हारा परिवार कहा है? मिलवाओगे नहीं? " मैंने अपने ऊपर से उसका ध्यान हटाने के लिए पूछ लिया।

"परिवार? कौन ? ओहहह... मेरी बीवी- बच्चों के बारे में पूछ रही हो? नहीं है.... मैंने शादी ही नहीं  की... किसी से प्यार किया था... शिद्दत से... सोचा था.... उसी से शादी करूँगा...पर शायद उसने इंतज़ार करना ठीक नही समझा ... तो अकेला हूँ.... नौकरी लगी....  यहीं हूँ पूरे 25 सालों से..."

उसके तीर जैसे शब्दों ने मेरा दिल भेद डाला.... मगर मैं उसे अपने ज़ख्म कैसे दिखाऊं? कैसे बताऊँ उसे कि मेरे साथ क्या- क्या हुआ... वैसे भी अब कोई फ़ायदा नहीं...

कुछ लोगों के लिए इंतज़ार सारी उम्र की वो सज़ा बन जाता है... जिसके हर कदम पे दर्द बेशक़ अपना होता है... पर आंसू दूसरों के लिए होते हैं।  मेरा इंतज़ार कभी ख़त्म नहीं होगा... मुझे पता है! मगर, उसका इंतज़ार..... उसका क्या? मैं एक ऐसी कश्ती पे थी, जिसका मांझी अपनी ही धुन में चल रहा था .... मगर सतीश की कश्ती.... साहिल पे हो के भी... डूब रही थी ... और मैं कुछ नहीं कर सकती थी...





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