ख़ामोशी ही पढ़ लेना...





                   तुम नहीं होते तो न जाने कितनी बातें करती हूँ तुमसे... आज ये हुआ...वो हुआ।
 अलमारी में रखे तुम्हारे कपड़ों से.... तुम्हारे लगाए पौधों से... कुछ न कुछ शिक़ायत या फिर कोई ख्वाहिश ही।
कभी तुम्हारे रूठने पे मनुहार तो कभी तुम्हारा मनपसंद गीत ही गुनगुना देती हूँ, जैस कि तुम सुन रहे हो।
कभी तुम्हारे होने के एहसास से शर्मा जाती हूँ तो कभी। .. तुम्हारे न होने का दर्द खुद से ही बाँट लेती हूँ।

         
                                           सोचती हूँ ... इस बार आओगे तो तुम्हे कहाँ रखूँगी ?
                            दिल के हर कोने को तुम पहले ही तो घेर चुके हो... अब क्या बचा है ?
पर इतनी बातें होते हुए भी, जब तुम सामने आते हो...... कुछ कहना याद ही नहीं रहता।  शायद खुद से इतना बात कर कर के होंठ भी थक जाते हैं मेरे ... बस आँखें ही प्यासी रह जाती होंगी तुम्हे देखने को .... सो एक टक तुम्हे देखने के अलावा कुछ और सूझता ही नहीं।



                      इस बार आओ तो कुछ कहने को मत बोलना  ... मेरी ख़ामोशी ही पढ़ लेना ...
                                          शायद तुम्हे कोई बात सुनाई दे ही जाए!


image: writerscafe.org
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