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Showing posts from July 10, 2015

Woh Musafir......

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आज फिर ट्रेन में बैठी हूँ। और फिर वो मन्ज़र आँखों के सामने है  ..... 
ट्रेन की धधक धधक। …ओर वो गाना गुनगुनाते हुआ उसका आना .... पहले इधर उधर सीट ढूँढना और फिर ख़फ़ा सा हो के आगे की साइड लोअर सीट पे उसका बैठ जाना .... वहाँ से छुप छुप के देखना और आँखें मिलते ही मुस्कुराना .... 
आज भी कितना याद आता है....... तुम्हारा वो आँखों ही आँखों में  बात कह जाना ....  फिर मिलेंगे क्या ? हर लम्हा यही सवाल मेरे ज़ेहन  में आना ….. ना जाने कब तक, हम एक दुसरे को दूर से, अजनबियों की तरह देखते रहेंगे ....... 
"ऋचा ..... कहाँ खो गयी हो ?" "नहीं  यहीं हूँ.… बोलिए ना क्या हुआ ? " मैं ठिठक के पति देव से बातें करती हूँ और उन बीते पलों को थोड़े वक़्त के लिए दरकिनार करती हूँ। 
अजीब होता है मन .... जब लग जाए, तो लगता ही नहीं और न लगे, तो कहाँ लगता है?

 इस बात को आज 2 साल हो गये। 2 साल पहले यूँही अगस्त में , बारिश से बचने के लिए ट्रेन में चढ़ गई , अपनी सहेलियों के साथ। जाना कहीं नहीं पर चढ़ गयी .... सोचा चेन खींच दूँ और उतर जाऊँ .... पर हिम्मत ही नहीं हुई....  
भोपाल से हबीबगंज ज़्यादा दूर नहीं , पर वहाँ…