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घर वापसी (भाग ५ "उम्मीद का तोहफा")

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घर वापसी  (भाग ५  "उम्मीद का तोहफा")
भाग- १ यहाँ पढ़ें https://www.loverhyme.com/2018/05/blog-post_99.html 
भाग -२ यहां पढ़ें https://www.loverhyme.com/2018/05/blog-post_25.html
भाग ३ यहां पढ़ें https://www.loverhyme.com/2018/05/blog-post_72.html
भाग ४ यहाँ पढ़ें https://www.loverhyme.com/2018/05/blog-post_27.html








उस दिन तो कैलाश चला गया, पर उसका ये कहना कि वह मुझे इस दल-दल से निकालना चाहता है, कुछ देर के लिए अच्छा लगा सुनके। शायद मैं अपने परिवार के पास चली जाउंगी।पर ये सब इतना आसान नहीं जितना लगता है।



३ साल के इस सफर ने मुझे कितना पत्थर बना दिया , ये मुझे ही पता है। वो पहला दिन भी याद है मुझे, जब यहाँ लायी गयी थी.... धोखे से ! और फिर ज़ोर- ज़बरदस्ती से तिल-तिल कर के मारी गयी रोज़, तक तक...  जब तक कि इस पिंजरे के दरवाज़े खुले होने पे भी मैं यहाँ से भागने की कोशिश न कर सकूँ। 


अपना घर , परिवार छोड़ चुकी औरत पे तो हर कोई हक़ समझता है।सड़क पे होते हर उस शर्मनाक हादसे में औरत जीते- जी मरती है ... कुछ तो ये समाज उसकी ज़िन्दगी दुश्वार कर देता है और कुछ अपने ही लोग....



और यहाँ ....  चंद पैसो…

घर वापसी (भाग ४ -" ख़ामोशी का तूफ़ान")

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भाग ४ -" ख़ामोशी का तूफ़ान

भाग- १ यहाँ पढ़ें https://www.loverhyme.com/2018/05/blog-post_99.html 
भाग -२ यहां पढ़ें https://www.loverhyme.com/2018/05/blog-post_25.html
भाग ३ यहां पढ़ें https://www.loverhyme.com/2018/05/blog-post_72.html











५ दिन बीत गए... वो नहीं आया।  आया तो मेरी बला से ... मुझे क्या?  और हज़ारों हैं यहाँ आने वाले... पौधों को पानी देती-देती बड़बड़ा रही थी मैं।



गीले बालों में तौलिया लपेटे हुए... बारिश के मौसम की धूप का मज़ा ले ही रही थी, कि अफ़रातफ़री मच गयी। बुलबुल चहकती हुई वीना के कान में कुछ फुसफुसा रही थी।  वैसे भी उसे काम ही क्या !



"दीदी... वो आ गया फिर। " हौले से मेरे कान में बताने को वीना  दबे पाँओं पहुंची थी।



"तो !!! मैं क्या करूँ?  जा के बोल दे उसे और अम्माजी से ... किसी और को भेज दें उसके स्वागत में, मुझे माफ़ करें ", मैं गुस्से में वीना से बोली।



"हाँ तो तुम्हे कौन मिलने आएगा ... नकचढ़ी लड़की! यहाँ जिसके ऊपर हाथ रखदूँ ना...पैसे निकाल के... खुद वो मेरे पैरों  में गिरेगी ", कैलाश के तीखे शब्द मेरे कानों को भेद रहे थे।



  गुस्स…

घर वापसी (भाग ३ "छुपे आंसूँ ")

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भाग ३  "छुपे आंसूँ "


भाग- १ यहाँ पढ़ें https://www.loverhyme.com/2018/05/blog-post_99.html 
भाग -२ यहां पढ़ें https://www.loverhyme.com/2018/05/blog-post_25.html







"आज भी पैसे बर्बाद करने आये हो?", मैं उसे छेड़ते हुए बोली।


"कुछ पुछूँ तो बताओगी?  उस दिन की तरह मूर्ति तो नहीं हो जाओगी?", कप रखते हुए, वो मेरी नक़ल उतारता हुआ बोला।


देखते ही मेरा लबों से हँसी फ़ूट पड़ी।  इतना हँसी इतना हँसी कि आँखें आंसुओं से भर गयी। मेरा हँसना कब रोने में बदल गया, मुझे भी पता न चला।


और कब उसके कंधे पे मेरा सिर और उसकी बाहें मुझसे लिपटी.... नहीं पता।  बस दरवाज़े को बंद करता, इक ज़ोर से धड़ाम की आवाज़ ने  हमे चौंका दिया। और अम्माजी बाहर से चिल्लाती हुुई निकली, "कम- से- कम ई दरवज्जा लगाय लेना था , चिटकनी नहीं का ... "


झट से उससे बाहें छुड़ा, मैं कमरे के दुसरे ओर जा पहुंची।


आज ये शाम  भी न जाने, कब दफ़ा होगी। खीझ सी होने लगी है इस बंद कमरे में।



"मेरा नाम नहीं पूछा तुमने अब तक। सोचा खुद ही बता दूँ। मेरा नाम कैलाश है। तुम्हारा क्या है?" ये बड़ा अजीब तरीका जान- पहचान  का।


घर वापसी ( भाग -२ "तनहा है खुद तन्हाई ")

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भाग-२  "तनहा है खुद तन्हाई "




भाग- १ यहाँ पढ़ें https://www.loverhyme.com/2018/05/blog-post_99.html 












रात हो चली.... मगर आँखों में नींद नहीं।  आज ४ दिन हो गए इसी तरह।

 दिमाग के घोड़े चल चल के थक गए हैं... शायद।

३ साल हो गए यहाँ मुझे, अम्माजी के यहाँ ... मगर कोई पैसे दे के तन्हाई भर गया, ये अजीब वाक़या पहले कभी नहीं हुआ...

लोग तो इन बंद चारदीवारों में खुद के बोझिल होते मन की किसी और के जिस्म पे लादने भर आते।  आखिर क्यों?

मेरे दिमाग में इतने सवाल, पर कोई जवाब नहीं।  शायद आज नींद भी नहीं आएगी।  बिस्तर भी काट रहा ... बैठ के खिड़की से खाली आसमान ही देख लेती हूँ।

"दीदी ... सो जाओ ना ... अम्माजी गुस्सा करेंगी अगर सुबह आँखें सूजी हुई देखी उन्होंने ... "

वीना के खर्राटे शुरू हो चुके थे ... और मैं.... शायद मेरी आँखें खुल चुकी थी।


ज़िन्दगी कितनी अजीब है ना ... जब सब देती है तो अकल पे पत्थर पड़ जाते हैं और जब सब समझ आ जाए तो हाथ बंध चुके होते हैं।

अतीत की परछाईयाँ उस हिलते परदे के पीछे से लुका- छिपी खेलने लगी। 

काश उस दिन मैं, यूँही गुस्से में घर से न निकली होती ....  काश म…

घर वापसी ( भाग - १ "सब बिकता है")

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भाग - १  "सब बिकता है"





ज़िन्दगी न जाने किस क़र्ज़ का ब्याज मांग रही है? कुछ देर तन्हाई भी नहीं मिलती और... एक नयी सुबह रात की तरह आँखों -आँखों में गुज़र जाती है।

अम्मा एक नया ग्राहक लायी हैं। मुझे उसे खुश करने का कह गयी.


आईना भी जैसे बेपर्दा होके, मेरे जिस्म पे पिछली रात के रिसते हुए ज़ख्मों पे हँस रहा हो।

" ये क्या? मांग सूनी क्यों राखी तुमने? और गला.... अरे मंगलसूत्र पहना करो न!  इस तरह सादी मत रहा करो। " रत्नेश की आवाज़ कानो में घुल रही थी।

बिख़री यादों की अलमारी कभी ठीक नहीं होती।  उनपे चढ़ी धूल कभी धुंधली नहीं होती।

ज़ोर की आवाज़ ने मेरी यादों की अलमारी आखिर कब बंद करवा दी पता ही न चला।

"दीदी दरवाज़ा खोलो... अम्माजी बोली बस आधा घंटा और... तैयार हो गयी क्या? दीदी?" वीना बाहर  दरवाज़ा फोड़ रही थी।

" बस हो ही गयी ... सुनना ... कुछ खाने को ला दे।  भूख लग आयी। ", मैं कह के गुसलखाने में तौलिये संग चल पड़ी।

ये बदनाम गली न जाने कितने नाम वालों को बाहें खोल बुला रही है ... "

बदनाम???"

एकाएक  मेरी हँसी फूट पड़ी।


तैयार होकर, कुछ फ़ीकी सी मुस्कान …

कब तक रूठोगे भला?

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दस बार उठे होंगे हाथ तुम्हे कुछ लिखने को,
पर दिल थम जाता है तेरा नाम ही लिखते... सुन रहे हो!

कोई लफ्ज़ लिखा जाता नहीं, स्याही शर्मा सी जाती है,
कागज़ को भी जैसे गुदगुदी हो जाती है.

हँस लेती हूँ सोच के तुम क्या आगे कहोगे?
मेरी नादानियों पे थोड़ा तंज़ कुछ तो कसोगे.

फ़ोन इक तरफ रख के ज़ोर से हँस लेती हूँ,
कुछ दिन और यूँ रूठी हुई रह लेती हूँ.

दो बार तो तुमसे फ़िर मुड़ मुलाक़ात की है,
इस तीसरी बार थोड़ा इत्मिनान रख लेती हूँ.

इस ख़ामोशी में तेरी जली-कटी फिर सुनलेती हूँ,
क्या करुँ ... तेरी बेरुख़ी सह लेती हूँ.

कुछ सुनने से सुनाना भला?
अरे कहो भी कुछ... कब तक रूठोगे भला?


Image:www.123RF.com


To be a Queen...

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I was brought up as a princess... and you know what that means?
It means, that I had all of my wishes come true... or to say ... all were made true by my dad.
I was handed over to a king... because a queen is said to belong to a king and not to anyone less.
So... I became a Queen!
A queen, infamous of required action, because my king was the ruler...and I, mere a spectator. But the reigns soon fell into my hands, when the king lost his life... and I had to become the king, inspite of being the rumoured- inefficient queen.
I bore no child so the kingdom was nevertheless my own family... they were my children and I their mother and this is what I assumed and failed miserably at.
Lost in the cascade of battles, I was torn like a piece of cloth and sold like meat. The buyer was...ofcourse a king and, I a hopeless slave.




I was held captive...not even given the status of a royal in prison but... a slave to whom the king could keep... as a war prisoner.

Life was never a burden before... but …